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Thursday 17 August 2017
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‘थ्री इडियट’ व ‘चमेली’ को ढूंढ़ते रहे दर्शक

आमिर खान अपनी नायाब फिल्मों के कॉमर्शियली हिट से हर बार  अधिक पा जाते हैं. उनका कद उनकी फिल्मों से अधिक लम्बा दिखाई देता है. ऐसा लगता है कि हर बार वे कुछ कहने आये हैं. सत्यमेव जयते के बाद टाइम मैगजीन के कवर पर उनकी ये इमेज अधिक मजबूत होती चली गयी है.

बात अगर हालिया रिलीज तलाश की करें तो आम दर्शकों को रीमा कागती के सधे निर्देशन में भी  वो आमिर यहाँ नहीं दिखाई देते हैं जिसे लोग सरफऱोश, लगान, थ्री इडियट और तारे जमीं पर में देखते हैं. फिल्म की शुरुआत कार के दुर्घटनाग्रस्त होकर समंदर में डूब जाने से होती है. इस हादसे में एक्टर अरमान कपूर मारा जाता है, केस सौंपा जाता है, कर्तव्यपरायण एवं निर्भीक ऑफिसर सुरजन सिंह शेखावत (आमिर खान)  को. कहानी तफ्तीश के साथ आगे बढ़ती है, कई किरदार बीच में ही मारे जाते हैं. कहानी बीच में ही है. इस उलझे हुए केस में सिमरन नामक वेश्या ( करीना कपूर) शेखावत की मदद करती है. मगर शेखावत की तफ्तीश को तब ब्रेक लग जाती है, जब उसी घटनास्थल पर उसी अंदाज में शेखावत की कार भी समंदर में जा गिरती है, यहां दर्शक हैरत और थ्रिल महसूस करते हैं, साथ ही कहानी का चरमोत्कर्ष भी. इसे अगर फिल्म का पहला हिस्सा मानें तो सब कुछ ठीक है. इस दौरान सुरजन काफी सख्त मिजाज होता है. उसे अपने इकलौते बेटे को हादसे में गंवा देने का दर्द भी अपने सख्त चेहरे के पीछे छिपाना होता है. उसकी अवसादग्रस्त पत्नी सुनैना (रानी मुखेर्जी) से उसके रिश्ते शुष्क हो चले हैं. वह अपनी पत्नी को इसलिए फटकार लगाता है क्योंकि वह एक ऐसी महिला से हिलने मिलने लगती है जो कि मृतात्माओं को प्लेन चिट पर बुलाने की क्रिया जानती है. इस हादसे के बाद कहानी में ट्विस्ट आता है, सुरजन को भी अपनी सोच को बदलना होता है. फिल्म की खूबी यह है कि दर्शकों को बांध कर रखने में यह सफल साबित होती है. तीन बड़े स्टार के होने के बावजूद गैंग्स ऑफ़ वासेपुर से चर्चित हुए नेवाज़ुद्दीन तैमूर की भूमिका में प्रभावित कर जाते हैं. मुस्कान झूठी है और जी ले जरा जैसे गीत देर तक दिमाग में घूमते हैं. पूरी फिल्म एक ईमानदारी से गढ़ी गयी लगती है. सम्पादन, सिनेमाटोग्राफी, डायलॉग्स में स्तरीय छुअन दिखाई देती है, अगर कहीं कमी दिखती है तो आमिर का कद, जो कि उनकी हर फिल्मों में बड़ा होता दिखाई पड़ता है. सस्पेंस के ख़त्म हो जाने पर यह फिल्म अपनी रिपीट वैल्यू को खोती दिखाई पड़ती है. अभिनय के मामले में आमिर ने फिर अपना सिक्का जमाया है. वेश्या बनी करीना अपनी चमेली वाले रोल से उन्नीस दिखाई पड़ती है. रानी ने अपनी भूमिका में ईमानदारी बरती है. यह फिल्म पूरी तरह से थ्रिलर है, आत्माओं के वजूद को नकारने वाला सख्त मिजाज़ ऑफिसर बाद में इन शक्तियों के वजूद को स्वीकार कर लेता है. कब्र से कंकाल निकाल कर उनका दाह संस्कार भी करता है और अपने मृत बेटे करण के प्लेन चिट वाले नोट को पढ़कर फफक पड़ता है. आम दर्शक आमिर जैसे एक्टर को आत्माओं के वजूद के आगे घुटने टेकने पर निराश होते हैं क्योंकि उन्हें सत्यमेव जयते वाले आमिर की तलाश होती है.
– राजेश पाण्डेय
फिल्म समीक्षक




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