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Friday 23 June 2017
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रियो पर न रोयें, टोक्यो की करें तैयारी

sakshi-sindhuरियो ओलिंपिक का हाल देख सच में रो उठता है दिल. बार-बार सवाल उठता है कि आखिर ऐसे में ओलिंपिक में तिरंगा कैसे लहरेगा. हमें शुक्र मनाना होगा महिला पहलवान साक्षी मलिक और बैडमिंटन की स्टार खिलाड़ी पीवी सिंधु का, जिन्होंने कांस्य एवं रजत पदक जीत कर भारत को शर्मसार होने से बचा लिया, वरना सवा करोड़ से अधिक आबादी वाले देख में पदक का सूखा रहता़. पटना से खेल पत्रकार अमरनाथ की पड़ताल करती रिपोर्ट का स्पष्ट संदेश है कि 2020 में टोक्यो में होने वाले ओलिंपिक में राष्ट्र ध्वज लहराना है, तो भारत को अभी से तैयारी करनी होगी. 

 

Amarnathसुपर पावर उसे माना जाता है, जो देश सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी तौर पर मजबूत हो, प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण हो, ताकतवर और आधुनिक सैन्यशक्ति हो. जिस देश की बात दुनिया सुने और जिसके एथलीट खेल के मैदान में भी झंडे गाड़े. जो भी देश सुपर पावर कहे जाते हैं, वे खेलों के भी पावर हाउस हैं, लेकिन भारत को रियो ओलिंपिक के महाकुंभ में अपनी ताकत का एहसास हो गया. छोटे-छोटे देशों के एथलीटों ने सोने का तगमा जीत कर अपने देश का नाम रोशन किया, मगर भारत का कोई ऐसा खिलाड़ी यह उपलब्धि हासिल नहीं कर सका, जिसे दुनिया सलाम करती और हम सब भारतीय भी गौरवान्वित होते.

पहला पदक में ही लग गये 112 साल
सूचना प्रौद्योगिकी के दम पर सुपर पावर होने का दंभ भरने वाले भारत को ओलिंपिक में पहला व्यक्तिगत स्वर्ण जीतने में करीब 112 साल लग गये. एक सौ 32 करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश को बीजिंग ओलिंपिक को छोड़कर किसे नहीं खलती, जिसकी वजह से हमारे देश के खिलाड़ियों की प्रतिभाओं पर सवाल उठने लगे हैं?

हमें मजबूत होना होगा…
दरअसल, अनुवांशिक तौर पर हम उतने मजबूत ही नहीं हैं, जितने दूसरे देशों के एथलीटों को विश्वस्तरीय सुविधाएं मुहैया करायी जाती हैं. सच तो यह है कि देश में खेल संस्कृति कभी बन ही नहीं पायी जिसकी वजह से पदक हाथ नहीं लग रहे हैं. खेल में कुछ हासिल करने के लिए सदियों पुरानी सोच अब भी नहीं बदली है. सुविधाओं का अभाव, खराब स्वास्थ्य, गरीबी, लड़कियों को खेल से दूर रखना, माता-पिता का बच्चों को डॉक्टर-इंजीनियर बनने के लिए प्रेरित करना, क्रिकेट की लोकप्रियता, हॉकी की सुनहरी सफलता का धुंधला पड़ना और ग्रामीण इलाकों में ओलिंपिक के बारे में कम जानकारी इसके कारण हैं, जो विश्व के छठे हिस्से की जनसंख्या वाले देश को ओलिंपिक में शून्य बनाता जा रहा है.

चैंपियन एक रात में तैयार नहीं होते
खेल के मैदान पर देश का प्रदर्शन उसकी आर्थिक मजबूती का भी संकेत देता है. इसके अलावा जिस देश में महिला समानता और सशक्तीकरण हो, उस देश से चैंपियन अधिक निकलते हैं. खेलों की मेजबानी करने से भी देश में खेल के लिए माहौल तैयार होता है. देश में स्कूल स्तर से खिलाड़ी तब तक सामने नहीं आयेंगे, जब तक खेल को पढ़ाई के बराबर महत्व नहीं मिलेगा. जब तक खेल को कैरियर का विकल्प नहीं बनाया जाता. जरूरत यह है कि हर स्कूल की हर कक्षा में एक खेल पीरियड हो, जिसमें ऐसे बच्चों को रखा जाये, जिनकी रुचि पढ़ने से अधिक खेल में हो. उन्हें स्कूलों में ट्रेनिंग की विश्व स्तर की सुविधाएं मिलें. विश्व स्तर के कोच मिले, पौष्टिक आहार की सुविधा हो, प्रतिभा वाले बच्चों को स्कॉलरशिप दी जाये. भविष्य में नौकरी की व्यवस्था होनी चाहिए.

राजनीति और भ्रष्टाचार देश के हर अंग को दीमक की तरह चाट रहे हैं. देश में खेल संघों पर राजनेताओं और कारोबारियों का कब्जा है, जिनका खेल से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है. खेल संघों पर बेमेल और नाकाम अधिकारियों के दखल का नतीजा देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भुगतना पड़ रहा है.

ग्रामीण इलाकों में बिखरी पड़ी हैं प्रतिभाएं
ग्रामीण और खासकर आदिवासी इलाकों में प्रतिभाएं बिखरी पड़ी हैं. आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा यह तबका खेलों के जरिये अपनी किस्मत बदलने के लिए तैयार बैठा है. हमारे कैंपों की मूलभूत सुविधाएं, आधारभूत संरचना, ट्रेनिंग के तरीकों और सबसे जरूरी एथलीट के खान-पान को शोभा डे ने देखा होता, तो भारतीय एथलीटों की खिल्ली नहीं उड़ातीं.

राजनीति और भ्रष्टाचार से बचाना होगा
राजनीति और भ्रष्टाचार देश के हर अंग को दीमक की तरह चाट रहे हैं. देश में खेल संघों पर राजनेताओं और कारोबारियों का कब्जा है, जिनका खेल से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है. खेल संघों पर बेमेल और नाकाम अधिकारियों के दखल का नतीजा देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भुगतना पड़ रहा है. अधिकारियों की खींचतान के कारण 2012 में ही एआइबी ने देश के मुक्केबाजी संघ की मान्यता खत्म कर दी थी. चार सालों से फेडरेशन नहीं होने के कारण राष्ट्रीय प्रतियोगिता तक नहीं हुई. प्रतिबंध की वजह से भारत के कोचिंग स्टाफ विदेशी बाउट में शामिल नहीं हो पाये, जिसका परिणाम हमें रियो में देखने को मिला.

भारत ने मास्को में जीते थे 12 पदक
ओलिंपिक इतिहास में भारत ने मास्को (1980) में 12 पदक जीते थे. इसके बाद लंदन (2012) में सबसे सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दो रजत और चार कांस्य पदक थे. रियो ओलिंपिक में लगा कि अब तक का सबसे बड़ा भारतीय दल नया कीर्तिमान बनायेगा. मगर, सारे दिग्गज खिलाड़ी उम्मीदों पर खरे नहीं उतर सके. हमें शुक्र मनाना होगा महिला पहलवान साक्षी मलिक और बैडमिंटन की स्टार खिलाड़ी पीवी सिंधु का, जिन्होंने कांस्य एवं रजत पदक जीत कर भारत को शर्मसार होने से बचाया. क्रिकेट का विश्व कप तीन बार जीत कर भारत भले ही दुनिया को अपनी ताकत दिखा चुका है. लेकिन, हर चार वर्ष बाद होनेवाले इस महाकुंभ में खुद पता चल जाता है कि हम कितने पानी में हैं और कितने आगे जा सकते हैं. 2020 में टोक्यो में होने वाले ओलिंपिक में राष्ट्र ध्वज लहराना है, तो भारत को अभी से तैयारी करनी होगी.
(नोट : लेखक के ये निजी विचार हैं)




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