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Saturday 23 February 2019
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केंद्र की हर नाकामी का उत्तर देगा ‘उत्तर प्रदेश’

युवा पत्रकार विवेकानंद सिंह अपनी लेखनी में खास पहचान रखते हैं. चाहे रपट हो, लेख हो, आलेख हो, रिपोर्ताज हो, कहानी-कविता हो, सबमें इनकी जबरदस्त पकड़ है. प्रस्तुत है IIMC पासआउट विवेकानंद के फेसबुक वाल से लिया गया यह आलेख…

सरकार की हर नाकामी का उत्तर देगा ‘उत्तर प्रदेश’

2019 के लोकसभा चुनाव में 80 सीटों वाली ‘उत्तर पदेश’ पूरे देश की ओर से मोदी सरकार की नाकामियों को उत्तर देने का काम कर सकती है। 2014 में मोदी सरकार के हिस्से ’73’ सीटें आयी थी। इस दफे ये नम्बर पलट भी जाएं तो मोदी सरकार के लिए स्थिति सम्मानजनक होगी।

दरअसल, सपा और बसपा का साथ आना कोई मामूली घटना नहीं है। दोनों दल एक बार 1993 में मिले थे, तब इन्हें प्रचंड जीत मिली थी। लेकिन उसके कुछ वर्ष बाद से ये दोनों दल आमने-सामने रहे।

ऐसे में इनका साथ आना मोदी सरकार के इलेक्शन मैनेजमेंट की नैचुरल काट है, क्योंकि यह सामाजिक रूप से एक मजबूत गठबंधन है। खास बात है कि अल्पसंख्यक-पिछड़ों के साथ यूपी में यदि दलित वोटर आ जाएं वे 90 फीसदी सीटों पर डिसायसिव हैं।

अभी भाजपा के नेता भले ही कोई बयान दे लें, लेकिन उनकी चिंता के केंद्र में ‘उत्तर प्रदेश’ ही है। क्योंकि उत्तर प्रदेश के बिना पीएम की कुर्सी की रेस अधूरी है। बीजेपी को अब अनुप्रिया पटेल की पार्टी व अन्य पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों की बातें भी ज्यादा माननी होगी।

यहां सवर्ण आरक्षण लागू करने का लाभ भाजपा को जरूर यह होगा कि जो सवर्ण युवा रोजगार न मिलने से नाराज थे, वे नाराजगी भूल कर भाजपा को वोट करेंगे।

फिर भी सपा-बसपा गठबंधन को इससे बहुत परेशानी नहीं होने वाली है। हालांकि, बहुजन पॉलिटिक्स करने वाले सपा-बसपा ने बहुत ही हुलस कर आर्थिक आधार पर सवर्ण आरक्षण को सपोर्ट किया है।

कांग्रेस को इस गठबंधन में शामिल न करने के पीछे भी एक बहुत शानदार गेम प्लान है। वह है ‘नरेंद्र मोदी’ की ऊर्जा को डायवर्ट करना। नरेंद्र मोदी इस बार भी राहुल गांधी की डायनेस्टी (वंश, परिवार) पर हमला जरूर बोलेंगे।

नरेंद्र मोदी भाषण देने में महारत भी रखते हैं और इतिहास गवाह है कि इस देश की जनता भाषण से पेट भर लेने वाली रही है। मोदी जी की क्वालिटी है कि बिना कुछ किये भी वे भाषण से महल खड़ा कर सकते हैं। वे जिस भी विपक्षी पर लग जाएं, उसे दोयम दर्जे का साबित कर सकते हैं।

यूपी में वह किसे टारगेट करेंगे? कांग्रेस को या माया-अखिलेश की जोड़ी को? लेकिन यदि सबको किया तो नरेंद्र मोदी खुद के फैक्ट में उलझ कर रह जायेंगे। फैक्ट के लेवल पर गलतियां करने में तो मोदी जी वैसे भी मास्टर आदमी हैं। ऐसे में मोदी सरकार को अपनी नाकामियों को डिफेंड कर पाना काफी मुश्किल काम होगा। हालांकि, मेरा मानना है कि सपा-बसपा को आरएलडी यानी अजित सिंह की पार्टी से जरूर गठबंधन करना चाहिए। वह इन दोनों के गठबंधन के लिए और बेहतर होगा। खासकर वेस्टर्न यूपी में। नहीं तो वेस्टर्न यूपी में ‘राम भरोसे हिन्दू होटल’ चला कर भाजपा अच्छा स्कोर कर सकती है।

इधर बिहार से तेजस्वी यादव कल यूपी पहुंच कर मायावती और अखिलेश यादव से मिले। मुझे उम्मीद है कि उन्होंने दोनों से बिहार में महागठबंधन को समर्थन देने की अपील की होगी।

बसपा वोट प्रतिशत के मामले में देश की तीसरी लार्जेस्ट पार्टी है। बिहार में उनके समर्थन की वजह से प्रति सीट यदि महागठबंधन को दो-चार हजार वोट का भी लाभ हुआ तो उसका असर निर्णायक होगा। इन सबके बीच मोदी सरकार के पास बताने के लिए सिवाय ‘एक सच के’ कि उनको हराने के सभी इकट्ठे हुए हैं और कोई दूसरा ‘सच’ नहीं होगा। कयोंकि वे खुद कई झूठ के सहारे सरकार चला रहे हैं।

अभी चुनाव में समय है और अमित शाह चुप रह कर लड़ाई को देखने वालों में से नहीं हैं। वे कुछ-न-कुछ खेल तो जरूर करेंगे। लेकिन कुछ भी कर लें, वे 2014 वाला करिश्मा अब शायद नहीं दोहरा पाएंगे।




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