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Wednesday 13 December 2017
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जातिगत आरक्षण : यह आग कब बुझेगी ?

Jat protest in Panchkulaइस बात में कोई संदेह नहीं कि पिछले कुछ दशकों से आरक्षण का चेहरा मानवीय नहीं, क्रूर और अमानवीय दिखने लगा है. अब यह देश के ज़रूरतमंदों की कीमत पर राजनीतिक रूप से दबंग और आबादी में मजबूत जातियों की स्वार्थ-पूर्ति का साधन भर है. इसे लेकर जिस तरह असंतोष बढ़ रहा है, उससे देश में धीरे-धीरे गृह युद्ध की स्थितियां बनने लगी हैं. इस संभावित गृहयुद्ध को अपने स्वार्थ के लिए सभी राजनीतिक दल, चाहे वे राष्ट्रीय दल हों या क्षेत्रीय, हवा देने में लगे हैं… जातिगत आरक्षण को लेकर गुजरात के बाद अब हरियाणा में फैली आग पर देश के ख्यातिलबध साहित्यकार ध्रुव गुप्त का विश्लेषण.  

dhruv-guptहरियाणा में राज्य के शिक्षित और सुविधासंपन्न जाट जाति के लिए आरक्षण के पक्ष में जुटाई गई अराजक भीड़ और हिंसा के बहाने ही सही, आरक्षण के मुद्दे पर देशव्यापी बहस की शुरूआत हो चुकी है. यह विमर्श बेहद ज़रूरी भी था. यह बहस हाल में गुजरात के संपन्न पटेलों और राजस्थान के गुर्जरों के आरक्षण के पक्ष में हिंसक आंदोलनों के बाद भी शुरू हुई थी, लेकिन दुर्भाग्य से परवान नहीं चढ़ सकी. अगर इस समस्या पर अभी गंभीरता से नहीं सोचा गया तो कई और जातियों द्वारा भी आरक्षण की यह मांग उठनी तय है. संविधान निर्माताओं द्वारा देश की दलित और पिछड़ी जातियों के लिए एक सीमित समय के तक सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था एक सामयिक और सही क़दम था, मगर साढ़े छह दशक बाद अब यह आरक्षण सामाजिक बराबरी का हथियार नहीं रहा, लोकतंत्र के बड़े तमाशे और राजनीतिक दलों द्वारा वोट जुटाने के कारगर हथियार के रूप में तब्दील हो चुका है. आरक्षण लागू होने के बाद उसके परिणामों का विश्लेषण किया जाय तो जिन जातियों और समुदायों के लिए उसकी व्यवस्था हुई थी, उनके तीन-चार प्रतिशत बेहतर शिक्षित और सुविधासंपन्न लोग ही आजतक उसका लाभ उठाते रहे हैं. उनके बाद आरक्षित सीटों पर उनकी संतानें अपनी बेहतर शैक्षणिक पृष्ठभूमि और पहुंच के कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचती रही है. सही शिक्षा और साधनों के अभाव में ऐसी जातियों के अधिसंख्यक लोगों के लिए यह व्यवस्था मृगतृष्णा ही रही.

वोट बैंक ने बिगाड़ रखा है गणित
क़ायदे से आरक्षण की व्यवस्था की नियमित समीक्षा और मूल्यांकन कर उसे धीरे-धीरे समाप्त करने के बजाय राजनीतिक वजहों से उसका दायरा बढ़ाया जाता रहा है. इसका लाभ उठाने की होड़ अब राजनीतिक तौर पर और वोट बैंक की दृष्टि से मज़बूत उन जातियों में भी मची है जो न सामाजिक रूप से पिछड़े हैं और न आर्थिक तौर पर. लगता है कि एक सीमित अवधि के लिए लागू जातीय आरक्षण की यह व्यवस्था अंतहीन समय तक चलने वाली है. इस अराजक सिलसिले से मुक्ति पाने के लिए अब यह मांग भी उठने लगी है कि या तो सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था सबके लिए ख़त्म करो या सभी धर्मों और जातियों के गरीबों को आर्थिक आधार पर आरक्षण दे दो.

गृहयुद्ध की बनने लगी हैं स्थितियां
वैसे इस बात में कोई संदेह नहीं कि पिछले कुछ दशकों से आरक्षण का चेहरा मानवीय नहीं, क्रूर और अमानवीय दिखने लगा है. अब यह देश के ज़रूरतमंदों की कीमत पर राजनीतिक रूप से दबंग और आबादी में मजबूत जातियों की स्वार्थ-पूर्ति का साधन भर है. इसे लेकर जिस तरह असंतोष बढ़ रहा है, उससे देश में धीरे-धीरे गृह युद्ध की स्थितियां बनने लगी हैं. इस संभावित गृहयुद्ध को अपने स्वार्थ के लिए सभी राजनीतिक दल, चाहे वे राष्ट्रीय दल हों या क्षेत्रीय, हवा देने में लगे हैं. बेह्तर तो यह होता कि सरकारी नौकरियों में सभी तरह के आरक्षण की व्यवस्था समाप्त कर गरीबी रेखा के नीचे जी रहे सभी जातियों के युवाओं को मुफ्त और बेहतर शिक्षा, निःशुल्क कोचिंग, किताबें और दूसरे साधन मुहैय्या कराए जाते, ताकि वे किसी भी प्रतियोगिता में खुद को बेहतर साबित कर सकें. यह व्यवस्था मानवीय भी है, न्यायपूर्ण भी और ज्यादा व्यवहारिक भी. लेकिन सवाल है कि क्या अपना वोट बैंक खिसकने के भय से किसी भी राजनीतिक दल में यह साहस है कि वह आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था से छेड़-छाड़ भी कर सके ?
(नोट : लेखक के ये अपने निजी विचार हैं)




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