Search
Saturday 23 February 2019
  • :
  • :

वो पड़ोस वाली आंटी

Priyanka Om‘मैं हमेशा से यह सोचती थी कि एक बुजुर्ग दंपती का अकेले रहना कितना मुश्किल है, लेकिन अंकल-आंटी को देख कर कभी भी ऐसा नहीं लगा, जैसे उन्हें सहारे की जरूरत है’ हिंदी की सशक्त हस्ताक्षर युवा कहानीकार प्रियंका ओम की पूरी कहानी पढ़ें…

 

अफ्रीका के लिए मन में कई तरह के पूर्वाग्रह लिये सात साल पहले शनिवार की सुबह मैंने तंजानिया के दार-एस-सलेम की धरती पर पहला कदम रखा था. यहां रहते हुए दार सिटी मुझे इंडिया से कुछ ज्यादा अलग नहीं लगा. वही बड़े शहरों वाला भागमभाग और ट्रैफिक, लेकिन वीकेंड में सुकून भरा समंदर का किनारा और नारियल पानी के साथ केले का चिप्स.

प्रवास के तीसरे दिन ही पानी खत्म हो गया था. मैं भाग कर ऊपर रह रहे एशियाई परिवार के पास गयी. एक बुजुर्ग महिला ने दरवाजा खोला. मैंने पूछा – ‘आंटी यहां पानी आने जाने का कौन-सा समय है, क्योंकि मेरे यहां पानी नहीं आ रहा है.’
‘आपके इंडिया जैसा नहीं है दार, यहां 24 घंटे पानी आता है. आप चेक करिये, हो सकता है, पंप का स्विच ऑफ होगा.’
‘जी आंटी शायद…’ और थैंक्स कह कर मैं वापस आ गयी. देखा, पंप का स्विच ऑन था, लेकिन पानी नहीं आ रहा था, मैं वापस आंटी के पास गयी.
‘देखिए, आप बार-बार मेरे पास मत आइए, अपने कांट्रैक्टर को फोन कीजिए. मेरे घर गेस्ट आये हैं.’
आंटी का यह जवाब सुन मैंने उन्हें सॉरी कहा और वापस आ गयी थी.

जून के महीने में हल्की ठंड में न गरमी लगी और न नहाने के लिए पानी था, सो ज्यादा परेशानी नहीं हुई. शाम होने से पहले ही पतिदेव आ गये और उनके आने के आधे घंटे के भीतर ही कंपनी से पानी का टैंकर आ गया, जिससे न सिर्फ हमारी टंकी फुल हुई, बल्कि आंटी की टंकी भी फुल हुई, क्योंकि उनके यहां भी पानी खत्म हो गया था.
अगले दिन आंटी मुझसे मिलने आयी और कहा यदि मुझे कभी भी किसी तरह की जरूरत हो, तो मैं बिना संकोच उनके पास आ सकती हूं.

मेरा शुरू से मानना रहा है कि पड़ोसियों से अच्छे संबंध बनाये रखने के लिए उनसे मिलते-जुलते रहना चाहिए. इसके लिए शुरू-शुरू में बहाने की जरूरत होती है और सबसे बड़ा बहाना तो यहां कि भाषा थी, जिसके कारण मैं लगभग रोज ही आंटी के पास चली जाया करती थी और आंटी हर बार ये कहने से नहीं चुकती थी कि सीख क्यों नहीं लेती, बहुत आसान है. काफी हिंदी वर्ड्स भी हैं.
लेकिन, एक बिल्कुल अलग तरह की भाषा सीखना सब्जी की नयी रेसिपी सीखने जैसा आसान भी नहीं है. चाह कर भी कभी यह कह नहीं पायी.

बार-बार आंटी के पास जाते रहने से उनके और मेरे बीच पड़ोसी जैसा संबंध बनने लगा था. आंटी ने बताया कि उनके ग्रैंड पा इंडिया से यहां आ गये थे, अंकल और आंटी दोनों का जन्म यहीं हुआ है और उनके तीन बच्चे हैं, जो अलग-अलग देशों में सेटल्ड हैं.

मैं हमेशा से यह सोचती थी कि एक बुजुर्ग दंपती का अकेले रहना कितना मुश्किल है, लेकिन अंकल-आंटी को देख कर कभी भी ऐसा नहीं लगा, जैसे उन्हें सहारे की जरूरत है. बल्कि, मैंने तो आंटी को घर पर 20-22 लोगों को बुला कर पार्टी करते देखा और सबसे ज्यादा आश्चर्य तब हुआ, जब उन्होंने बताया कि पार्टी के लिए कुकिंग भी वे घर में खुद करती हैं, मेड की मदद से. मेरी आंखें फैली की फैली रह गयी थी और उनके चेहरे पर सिर्फ एक स्माइल थी.

आंटी ने बताया कि सिर्फ रात में ही वो कुक्ड फूड खाती है और बांकी के समय जूस, सलाद और फल ही खाती है. यही कारण है कि वे अपनी उम्र की बांकी की महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा जवान दिखती हैं और उनमें ज्यादा एनर्जी भी है.

मैंने नोटिस किया था कि आंटी मेरी तरह ही बाहर कम आती-जाती थी, ज्यादातर घर में ही रहती थी. एक बार मुझे किसी जरूरी काम से बाहर निकलना पड़ा, तो मैंने आंटी से पूछा, क्या वे मेरे लिए भी दूध ले लेंगी. तब आंटी ने अनमने ही हां कहा था, यह कहते हुए कि उनके फ्रिज में ज्यादा जगह नहीं है. लेकिन, बहुत जल्द ही आंटी को भी मुझसे ऐसी ही मदद की जरूरत हुई और मैंने वही किया, जो एक अच्छे पड़ोसी का कर्तव्य है. मैंने उनके आने के पहले ही दूध उबाल कर रख दिया.

उस दिन पहली बार आंटी मेरे घर के अंदर आयी थी और मेरी प्रशंसा करते हुए कहा था, ‘तुमने तो घर को बहुत साफ रखा है, तुमसे पहले जो यहां रहते थे, उन्होंने घर को बहुत गंदा रखा था.’ फिर धीरे-धीरे आंटी अक्सर मेरे पास आने लगी थी और धीरे-धीरे खुलने भी लगी थी. हमलोग खूब बातें करते. मैं उनसे खूब सवाल पूछती, अफ्रीका के बारे में, उनके शुरुआती जीवन के बारे में और उनके बच्चों के बारे में. वे मेरे सवालों से कभी परेशान नहीं होती थीं, बल्कि बहुत धैर्य से जवाब देती थीं
एक बार मैंने उनसे, मुझसे पहले जो रहते थे उनके बारे में पूछ लिया.

आंटी के चेहरे पर एक नागवारी-सा गुजरा, थोड़ी देर चुप रहने के बाद उन्होंने कहा था- वे बहुत अलग लोग थे. बहुत मतलबी थे. हां, तुम्हारी तरह अगर उन्हें भी लैंग्वेज की प्रॉब्लम होती थी, तो फौरन मेरे पास आ जाते थे, लेकिन घर के अंदर नहीं. शायद मुझसे घृणा करते थे, क्योंकि मैं मुस्लिम हूं इसलिए. मुझे क्या मेरे घर के बरतन को भी अपने घर के अंदर नहीं आने दिया कभी. वे लोग 13 साल इस घर में रहे, लेकिन हम कभी एक-दूसरे के घर नहीं आये गये।

मैं उनसे बहुत खुल कर बात करने लगी थी, जैसे कोई बचपन की सहेली हो. अब कभी-कभी वे घुमा-फिरा कर कोई सलाह भी दे देती थी, जो एक बुजुर्ग का फर्ज होता है और कभी मैं ही आगे बढ़ कर उनसे कोई सलाह मांग लेती. ऐसा लग रहा था, जैसे ईश्वर ने जीवन से मां के के मार्गदर्शन और परदेस में सास की कमी को आंटी के रूप में पूरा करने की कोशिश की है.

अब उनके पास रोज जाने के लिए बहाने की जरूरत खत्म हो गयी थी. अगर मैं नहीं जाती, तो वे बुलवा लेती मुझे और वीकेंड में हम एक-दूसरे को अपने किचेन में कुछ टेस्ट कराते, फिर रेसिपी शेयर करते.

दार में समय को जैसे पंख मिल गया था. देखते ही देखते दीवाली के बाद होली आ गयी. दीवाली के समय आंटी अपने किसी रिश्तेदार की शादी में केन्या गयी हुई थीं, लेकिन होली में यहीं थीं.
दार में मेरी पहली होली थी. मैंने अपने घर पर ही पार्टी रखी थी (आप समझ सकते हैं ये आंटी की संगत का ही असर था). आंटी ने होली पर खायी जाने वाली तीन प्रमुख डिश में से एक दहीबड़ा बनाने की जिम्मेवारी अपने सर ले ली.
इतना ही नहीं, जब सारे गेस्ट आये, तो उन्होंने न सिर्फ सबको सर्व करने में मेरी मदद की, बल्कि सबके साथ रंग और गुलाल के साथ खूब खेली भी. अपने अंदाज से आंटी मेरी पार्टी का एक अभिन्न हिस्सा बन गयी थीं. लेकिन, किसी ने उनका धर्म नहीं पूछा, न ही उन्होंने किसी को पूछने का मौका दिया. उसके बाद कई और होली हमने साथ में सेलिब्रेट की.

दो साल पहले वे अपने बड़े बेटे के पास लंदन गयी, तो फिर कभी वापस नहीं आयीं. अचानक ही वहां उनका देहांत हो गया. मैं आज भी कभी-कभी उनके घर के बंद दरवाजे तक हो आती हूं और होली पर तो मेरे साथ-साथ मेरा पूरा ग्रुप उनकी कमी को महसूस करके भावुक हो जाता है.




AD