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Friday 23 June 2017
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चीन-भारत : रिश्तों का मोल

Vivekanandयुवा पत्रकार विवेकानंद सिंह अपनी लेखनी में खास पहचान रखते हैं. चाहे रपट हो, लेख हो, आलेख हो, रिपोर्ताज हो, कहानी-कविता हो, सबमें इनकी जबरदस्त पकड़ है. प्रस्तुत है IIMC पासआउट विवेकानंद की फेसबुक वाल से ली गयी भारत-चीन के रिश्तों को पडताल करती रिपोर्ट.

 

 

चीन और भारत न सिर्फ दुनिया की दो बड़ी आबादी वाले देश हैं, बल्कि दो आर्थिक महाशक्तियां भी हैं. अगर दोनों मुल्कों के बीच मित्रता और व्यापार की स्थिति बेहतर हो, तो पूरी दुनिया के प्राइम टाइम डिबेट में इन दोनों देशों की नीतियों पर रोज बहस होने लगेगी. चीन की चाहत भी यही है कि पूरी दुनिया में अमेरिका की तरह उसकी चर्चा हो. फिर आखिर वे कौन-सी वजहें हैं कि चीन आसान रास्ता न चुन कर, कठिन रास्ते को चुनता है? वह क्यों बार-बार भारत के साथ डांडिया खेलता है? क्या उसे डर है कि तिब्बत उसके महाशक्ति बनने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बन सकता है? क्या चीन, भारत को अपने लिए खतरा समझता है?

अब नया मामला नदी के पानी का
पिछले दो दिनों में चीन ने फिर से यह साबित करने की कोशिश की है कि उसे भारत की परवाह नहीं है. ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी शियाबुकू पर चीन अपनी सबसे महंगी बिजली परियोजना लगा रहा है. अगर इस नदी का पानी रुकता है, तो भारत और बांग्लादेश पर इसका सीधा असर हो सकता है. इससे हमारे बेहतर होते ताल्लुकात ख़राब भी हो सकते हैं और ऐसा होने से दुनिया की महाशक्ति बनने का चीन का सपना अधूरा रह सकता है.

तो पाकिस्तान को होती परेशानी
पहले तो चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का सदस्य बनने से भारत को रोका और अब जैश-ए-मोहम्मद के चीफ मौलाना मसूद अजहर को आतंकी घोषित किये जाने में तकनीकी पेच लगा दिया. अगर अजहर ग्लोबल आतंकी घोषित होता, तो पाकिस्तान को उसकी घोषित संपत्ति जब्त करनी पड़ती. यह वही अजहर है, जिसे छुड़ाने के लिए आतंकियों ने इंडियन एयरलाइंस की विमान को हाइजैक किया था. इन करतूतों से चीन का तानाशाही चरित्र बार-बार उभर कर सामने आ जाता है.

भारत की हुकूमत को भी एक बात समझ लेनी होगी कि आखिर क्यों चीन हमारे साथ दोस्ती की जगह डांडिया खेल जाता है? उसके पीछे हमारी नीतियां जिम्मेवार रही हैं. हमें विश्व के साथ रिश्तों में अपनी शर्तों और हितों को ध्यान रखना होगा.

प्रायोजित खबरों से मीडिया बचे
लोगों को अज्ञात के भय से मुक्त रखना हर देश का मीडिया का उत्तरदायित्व है. हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि विदेशी कूटनीतिक मामलों पर ज्यादातर खबरें प्लांटेड होती हैं. चूंकि इंटरनेट ने हमें ग्लोबल बनाया है, इसलिए जानकारी के स्रोतों में बहुलता के साथ-साथ हमारे भ्रम में भी बढ़ोतरी हुई है. मुझे फक्र है कि भारत के मीडिया में उठने वाली लोकतांत्रिक आवाज, यहां की मीडिया की स्वतंत्रता का परिचय देती है. लेकिन, दुख इस बात का है कि सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिए कुछ पत्रकार राष्ट्र में अज्ञात के भय को बढ़ावा देते हैं. यह एक ऐसी सच्चाई है, जिस पर यकीन करना शायद मुश्किल हो, लेकिन चीन से मिलनेवाली लगभग हर खबर प्रायोजित होती है. भले ही वह जिन्हुआ जैसी न्यूज एजेंसी क्यों न हो.

फैसला उसे पड़ सकता है भारी
1962 से आज हम 2016 तक पहुंच चुके हैं, लेकिन चीन का व्यवहार विश्वासघाती ही रहा है. चीन भी आतंकवाद की जद में है, वहां भी कई आतंकी हमले हुए हैं, लेकिन एक आतंकवादी को लेकर उसकी दरियादिली, यह साबित करता है कि भारत से उसे चिढ होती है. अजहर मसूद पर लिया गया फैसला उसे ही भारी पड़ सकता है.

आखिर क्यों चीन खेल रहा है डांडिया
भारत की हुकूमत को भी एक बात समझ लेनी होगी कि आखिर क्यों चीन हमारे साथ दोस्ती की जगह डांडिया खेल जाता है? उसके पीछे हमारी नीतियां जिम्मेवार रही हैं. हमें विश्व के साथ रिश्तों में अपनी शर्तों और हितों को ध्यान रखना होगा. हम विश्वासघातियों से दोस्ती बढ़ाने के नाम पर अपने विश्वासपात्रों से संबंध क्यों खराब कर रहे हैं? जनता में संतोष का भाव भाषण से नहीं, बल्कि रोजगार से आता है. इसे सरकारों को जल्दी समझ लेनी चाहिए. चीन तानाशाह मुल्क होते हुए भी विद्रोह से बचा हुआ है, तो मुल्क के लोगों में राष्ट्रवाद और संतोष का भाव इसके प्रमुख कारण हैं.

और अंत में
हमें कब तक अपनी कमियों का अंदाजा होगा
अगर हम अपनी इकॉनोमी को समावेशी बना लें, तो चीन का डांडिया तुरंत रुक जायेगा. उन्हें हमारी कमजोरियों का अंदाजा है, लेकिन हमें कब तक अपनी कमियों का अंदाज़ा होगा?
(नोट : ये लेखक के निजी विचार हैं और इनसे न्यूज पोर्टल को कोई लेना-देना नहीं है)




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