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Thursday 17 August 2017
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बचपन की आरी-तिरछी लकीरों से चमकी किस्मत

Badal 3बचपन की आदत ने उन्हें कला की मंजिल पर पहुंचा दी. पढ़ाई से मन उचट जाता, तो पेंसिल को स्लेट पर दौड़ाने लगते. आरी-तिरछी लकीरें खींचते. देखते-ही-देखते पूरा चित्र स्लेट में उकेर देते. आज वे कला जगत में किसी पहचान के मुहताज नहीं हैं. कैनवास पर उनकी कूची चल पड़ती है और चित्र बोलने लगते हैं.  जी हां, हम बात कर रहे हैं बिहार ललित कला अकादमी के अध्यक्ष आनंदी प्रसाद बादल की. राजनीतिक अड्डा के लिए युवा पत्रकार रूपम त्रिविक्रम से बादल की बातचीत के प्रमुख अंश.

 

 

 

बचपन में पढ़ाई से मन ऊब जाता था, तो आरी-तिरछी लकीरें खींचने लगते थे. स्लेट नहीं मिला, तो जहां-तहां दीवारों पर भी लकीरें उकेरने लगते थे. कभी-कभी तो खेत व खलिहान ही उनके लिए कैनवास बन जाते थे. यह अलग बात है कि उस समय वे कैनवास का मतलब नहीं समझते थे. इसके लिए उन्हें स्कूल में गुरुजी और घर में पिताजी की डांट ही नहीं पड़ती, कभी-कभी मार भी खानी पड़ती थी. लेकिन चित्र उकेरने की यह आदत उनकी रूटीन लाइफ में शामिल हो गयी. और उसी अारी-तिरछी लकीरों ने आनंदी प्रसाद बादल को कला की मंजिल पर पहुंचा दी, जहां नाम, शोहरत के साथ उनके पीछे दौलत भी चलने लगी. आनंदी प्रसाद बादल ने बिहार के पूर्णिया से चल कर पटना में एक नयी मुकाम हासिल की और आज वे बिहार ललित कला अकादमी के अध्यक्ष पद पर काबिज हैं.

34 के भूकंप में छह-सात साल का था मैं
Badal 5बकौल बादल, 1934 के भूकंप के समय मैं छह साल का था. सच पूछिए तो पढ़ाई में मन नहीं के बराबर लगता था. वहीं चित्रकारी करने में काफी मजा आता था. जो मिला, उसी पर कलाकारी दिखाने की कोशिश करता. उस जमाने में जो घर की इनकम थी, उसमें कॉपी खरीदनी बहुत महंगी थी. जीवन के इसी उछल-कूद के बीच हमारी पढ़ाई और चित्रकारी भी चलती रही. इस तरह 1944 में मैंने मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली. साथ ही चित्रकारी में भी मेरी अंगुलियां अब सधने लगी थीं.

बचपन में नकल कर बनाते थे चित्र
बादल कहते हैं कि शुरुआत में मैं दूसरे के चित्रों को नकल करता था. जैसे-जैसे प्रैक्टिस होने लगी, चित्र हू-ब-हू उतरने लगे. महाराणा प्रताप, शिवाजी, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, वीर कुंवर सिंह आदि बनाये गये मेरे चित्रों को देख कर दोस्त से लेकर मुहल्ले के लोग वाह-वाह कह उठते थे, लेकिन पिताजी की डांट के डर से मैं अपने चित्रों को अपने ही घर में किसी को नहीं दिखा पाता था.

 

आनंदी प्रसाद बादल बिहार के सुप्रसिद्ध चित्रकार हैं, जिनके चित्रों को देखते हुए उनके श्रम एवं कलाकृति के प्रति गहरे सम्मान का भाव उत्पन्न होता है : मुख्यमंत्री

आज भी याद है वह छड़ी की पिटाई
आनंदी प्रसाद बादल को बचपन में छड़ी से हुई जबरदस्त पिटाई आज भी याद है. वे कहते हैं कि उस पिटाई में भी एक सीख थी जो हमें अंतिम सांस तक याद रहेगी. वे वाकये को याद कर बचपन में खो जाते हैं. बकौल बादल, बात तब की है, जब मैंने रुपये का चित्र हू-ब-हू उतार दिया था, तब मुझे इतनी ज्यादा मार पड़ी थी कि कह नहीं डांट पड़ी कि रुपये को बनाना ही भूल गया.

पिताजी चाहते थे कि दारोगा बनूं

Anandi Prasad Badal

Anandi Prasad Badal

बादल का कहना है कि पिताजी चाहते थे कि मैं दारोगा बनूं. इस चित्रकारी की दुनिया से कुछ नहीं होनेवाला है. पढ़ने-लिखने में समय दो और दारोगा की तैयारी करूं. नौकरी करोगे, तो दो-चार पैसा घर में आयेगा. इससे भविष्य बनेगा. लेकिन मेरे मन में चित्रकार बनने का भूत सवार था. सो, पढ़ाई-लिखाई से समय बचता, तो चित्र बनाने लगता. आज यही मेरी पूंजी है.

लाइफ की टर्निंग प्वाइंट रहा पटना आना
बादल जी के लिए पटना आना लाइफ का टर्निंग प्वाइंट रहा. वे बताते हैं कि 1954 में मैं घर की डांट-डपट से परेशान होकर पटना भाग आया. एक पोटली में सत्तू-भूंजा बांध लिया. लेकिन रहने के लिए इतने बड़े शहर में कोई ठिकाना नहीं था. ऐसे में हमारे लिए पटना जंकशन बसेरा साबित हुआ. सबसे बड़ी समस्या सामने आ गयी कि मेरा सत्तू-भूंजा खत्म हो गया. तीन-चार दिनों तक पानी पीकर रहना पड़ा, लेकिन यहां भी चित्रकारी से यारी नहीं छूटी. यहां वे पृथ्वीराज थियेटर से काफी प्रभावित हुए और काम में प्रति वे पूरी तरह समर्पित हो गये.

 

आज भी बादल जी को याद है वह दुखद पल. उस पल को याद कर वे मायूस हो उठते हैं. जहां वे रहते थे, वहां शॉर्ट सर्किट से आग लग गयी थी. उसमें उनकी बनायी सारी पेंटिंग्स जल गयी थीं. एकबारगी तो लगा उनकी पूरी दुनिया ही लुट गयी.

40 रुपये की छात्रवृत्ति ने नयी रोशनी दी
बात 1954 की ही है. मेरे एक चित्र को देख कर शारदा प्रसाद देव काफी प्रभावित हुए. उन्होंने मुझे बुलाया और कहा कि यह चित्र तुम बनाये हो, मेरे हां कहने पर उन्होंने मेरा एडमिशन आर्ट कॉलेज में करा दिया. इसके बाद तो लगा कि मुझे अपनी मंजिल की पहली सीढ़ी मिल गयी. इसके बाद मैंने काफी मेहनत की. तात्कालिक प्रिंसिपल राधामोहन सर का सानिध्य मिला, तो मेरी मेहनत और अधिक निखर गयी और मैं अपने क्लास में फर्स्ट किया. इससे उस समय के मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री ने मुझे 40 रुपये प्रतिमाह छात्रवृत्ति देने की घोषणा की. उस समय एक साल तक मुझे स्वीकृत छात्रवृत्ति ने मुझे नयी रोशनी दी. इसके बाद पेपर में डिजाइनर की नौकरी मिल गयी. वहां से पैसा मिलने लगा. इसके अलावा खादी ग्राम में भी 1961 में नौकरी लग गयी. वहां से 150 रुपये प्रतिमाह पगार मिलने लगी. इससे पिताजी खुश हो गये और मेरे भाई भी पटना आकर मेरे साथ रहने लगे. बाद में पूरा परिवार सेटल हो गये.

जब जल गयी थीं सारी पेंटिंग्स
Badal 2आज भी बादल जी को याद है वह दुखद पल. उस पल को याद कर वे मायूस हो उठते हैं. जहां वे रहते थे, वहां शॉर्ट सर्किट से आग लग गयी थी. उसमें उनकी बनायी सारी पेंटिंग्स जल गयी थीं. एकबारगी तो लगा उनकी पूरी दुनिया ही लुट गयी. लेकिन, फिर से उन्होंने नये सिरे से इस पर मेहनत की और आज फिर से उनके पास पेंटिंग्स की लंबी फेहरिश्त है, जिनको देख कर लोग वाह-वाह कह उठते हैं. उनकी तमाम पेंटिंग्स में एक यह पेंटिंग भी शामिल है, जिसमें चित्रों को जलते हुए दिखाया गया है. वे कहते हैं कि यह पेंटिंग उस दुखद पलों को याद दिला देती है.

 

कला में कौशल, तकनीक एंव विचारों का सवाल किसी भी चित्रकार के लिए उतना ही जरूरी है, जितना सृजन कर्म. निरंतर नया सोचना, गढ़ना और सर्वथा नये ढंग से देखना कलाकार को जिंदा रख सकता है : बादल

मैं हूं बादल
केवल पेंटिंग और पोरट्रेट में ही बादल की पहचान नहीं है. आनंदी प्रसाद बादल ने कई किताबें भी लिखी हैं. प्रकाशित किताबों में मूर्त रंग और अमूर्त रेखाएं, मेरी कला यात्रा, मैं हूं बादल, मेरे अमूर्त क्षण, मेरी कला यात्रा, श्रद्धांजलि तथा प्रभाव शामिल हैं. इसके अलावा कई किताबें प्रकाशन को तैयार है. इतना ही नहीं, कला संस्कृति विभाग ने योगदानों को देखते हुए आनंदी प्रसाद बादल को 2013 में लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया. वहीं समय-समय पर इन्हें एकल चित्र प्रदर्शनी से लेकर पेंटिंग तक के लिए नवाजा गया.

कहते हैं आनंदी प्रसाद बादल
कला में कौशल, तकनीक एंव विचारों का सवाल किसी भी चित्रकार के लिए उतना ही जरूरी है, जितना सृजन कर्म. निरंतर नया सोचना, गढ़ना और सर्वथा नये ढंग से देखना कलाकार को जिंदा रख सकता है. चित्रकार के चित्रों में उसके कला-धर्म में, उसके समय और समाज का प्रतिबिंब कभी साफ, कभी धुंधला-सा लग सकता है, पर कलाकार अपने समाज के अंदर से उपजी शक्तियों द्वारा ही संचालित होता है.

कहते हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार
आनंदी प्रसाद बादल बिहार के सुप्रसिद्ध चित्रकार हैं, जिनके चित्रों को देखते हुए उनके श्रम एवं कलाकृति के प्रति गहरे सम्मान का भाव उत्पन्न होता है. रंग और रेखाओं पर इनकी गति काफी सतुलित है. आज बादल जी जिस मुकाम पर पहुंचे हैं, वह इनके लगातार परिश्रम, लगन और कला-साधना का प्रतिफल है.




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